इस जगह पर किन्नरों की होती है शादी, अलगे ही दिन हो जाती है विधवा

Rochak News 04-07-2019 10:57:19
Kenners are married at this place widows are on the same day

नई दिल्ली। किन्नर का नाम लेते ही हमारे मस्तिष्क में उनके लिए एक अपवीत्र छवी तैयार होने लग जाती है। किन्नर के सम्बन्ध में आपने जरुर सुना होंगा, यह न तो पुरुष होते है और ना ही स्त्री, इसलिए ये शादी भी नहीं रचाते है, ऐसे में आपको यह बात जानकर हैरानी होंगी कि ये सिर्फ एक रात के लिए शादी करते हैं।

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पौराणिक कथाओं की माने तो, किन्नरों को एक भिन्न एवं  दिव्य स्थान दिया गया है। जहां सबके रीति रिवाज भिन्न होते हैं वहीं किन्नरों के रीति रिवाज बहुत अलग और हटकर होते हैं। ऐसा ही एक रिवाज है तमिलनाडु के एक गांव में जहां आज भी एक ऐसा पर्व मनाया जाता है जिसमें सभी किन्नर बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं। बता दें कि, तमिलनाडु के विल्लुपुरम के कूवगम गांव में भगवान अहिरावण हेतु एक विशेष पर्व होता है जिसमें सभी किन्नर उनसे शादी रचाती है एवं तत्पश्चात अगले दिन ही विधवा हो जाती हैं।

पौराणिक कथाओं में मान्यता
बता दें कि, ये कहानी एक पौराणिक कहानी से प्रारम्भ होती हैं जहां महाभारत के युद्ध से पूर्व एक भविष्यवाणी हुई थी कि वे ये युद्ध हार जाएंगे। पांडव इस भविष्यवाणी से चिंतीत होकर ज्योतिषी के पास जाते हैं जहां ज्योतिषी उन्हें मां काली के समक्ष एक आदमी की बली देने को बोलता है एवं मुश्किल यही थी की उन्हें किसी एक ऐसे आदमी की बली देनी थी जो जिसमें सभी गुण उपस्थित हो। 

धर्मर्या को इसकी चिंता होने लगी क्योंकि वहां सबमें केवल 3 ही महान लोग ऐसे थे जिनकी बली दी जा सकती थी जिसमें कृष्णा, अर्जुन एवं अहिरावण सम्मिलित थे। महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण तथा अर्जुन की बली नहीं दी जा सकती थी क्योंकि ये दोनों महाभारत के प्रमुख कड़ी थे। इसलिए भगवान अहिरावण ही बचे थे जिन्हें अपना जीवन त्यागकर युद्ध में पांडव को जीताना था। 

इसी बीच अहिरावण बली देने हेतु खुशी-खुशी राजी हो गए थे किन्तु इस बीच उन्होंने एक शर्त रखी थी जिसमें उन्होंने बताया था कि वे अपनी मौत से पूर्व वो विवाह करना चाहते हैं और उनकी इस इच्छा को पूर्ण करने हेतु भगवान कृष्ण मोहिनी रूप में अवतार लेकर आए तत्पश्चात अहिरावण का विवाह हुआ और अगले ही दिन उनकी मौत हो गई।

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किन्नरों की होती है भगवान अहिरावण से शादी
तभी से ही ये रिवाज चला आ रहा है इस पर्व को किन्नर लगभग 18 दिनों तक मनाते हैं तथा अहिरावण की कोतांडवार के रूप में पूजा करते हैं। यहां सभी किन्नर सज-धजकर मोहिनी रूप में तैयार होती हैं एवं अहिरावण को अपने पति के रूप में चुनती हैं। सिर्फ एक दिन में किन्नर अहिरावण से विवाह रचाते हैं और प्रथा के मुताबिक अगले ही दिन अहिरावण की मौत के बाद सभी किन्नर विधवा भी हो जाते हैं। 

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